दिल - ऐ - बेताब सीने में धड़कता क्यों है..
जब चलती है सर्द हवा.. यूं दर्द सा इसमें भड़कता क्यों है..
काश के होता मैं परवाना उस शम्मा का..
जलकर ही सही, छोड़ देता अफसाना उस समां का..
जिस शाम उसने चूमे थे ये लब लबों से ..
उस शाम को याद कर.. ये तड़पता क्यों है..
करता नही क्यों शिकवा अपने गम की मुझसे..
बता दिल - ऐ - नादान चुपचाप ही यूं मरता क्यों है
दिल - ऐ - बेताब सीने में धड़कता क्यों है..
जब चलती है सर्द हवा.. यूं दर्द सा इसमें भड़कता क्यों है..
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Monday, February 11, 2008
Sunday, February 10, 2008
इश्क
है ज़माना परेशान..के इश्क किसी बुलबुल का नाम है..
बिना नज़र के देखो.. ये नज़र भी इश्क.. ये जान भी इश्क..
इश्क है वो जज्बा.. जिससे दिल धड़कता है ..
इश्क है वो रूह.. जिससे इंसान बढता है..
जो कहते हैं की बेखबर हैं वो इस शबनम की रात से..
सच तो ये है की वो बेखबर हैं इस खूबसूरत सी बात से..
कि सभी झूटों में जो सच्चा है वो है इश्क..
है बुनियाद जिसकी इश्क.. इतना सच्चा वो है इश्क..
बिना नज़र के देखो.. ये नज़र भी इश्क.. ये जान भी इश्क..
इश्क है वो जज्बा.. जिससे दिल धड़कता है ..
इश्क है वो रूह.. जिससे इंसान बढता है..
जो कहते हैं की बेखबर हैं वो इस शबनम की रात से..
सच तो ये है की वो बेखबर हैं इस खूबसूरत सी बात से..
कि सभी झूटों में जो सच्चा है वो है इश्क..
है बुनियाद जिसकी इश्क.. इतना सच्चा वो है इश्क..
Thursday, January 17, 2008
आहटें
आहटें कहती हैं जो.. उनका फ़साना लगता है..
अकेले में भी हर वक्त.. उनका पास आना लगता है..
कुछ तो हो जो अब दिल को संभाले अपने..
अब तो हर वक्त जैसे.. इस दिल का जाना लगता है..
क्या कहूं के ये भोर है के शाम ..
यूं तो अब हमें हर वक्त ही सुहाना लगता है..
कहते हैं वो के.. "बातें" बना रहे हो तुम..
कैसे बतायें के.. उन्ही से हमें ये ज़माना लगता है..
...
...
दिल में तरंगें सी जो उठती हैं यूं ..
ये तो जैसे उनका गुदगुदाना लगता है..
हमें सताके हस्ते हैं वो.. नही जानते के ख़ुद भी फसते हैं वो..
दूर जाके जैसे फ़िर से पास आना लगता है..
चाँद में दिखता है जिसका चेहरा.. हर वक्त है जैसे जिसका पहरा ..
वो इंसान हमें अब खुदा से भी सुहाना लगता है ..
क्या बात है उनमे ऐसी .. ये हम नही जानते ..
लेकिन अब तो बस उनके लिए जीना .. फ़िर मर जाना लगता है ..
अकेले में भी हर वक्त.. उनका पास आना लगता है..
कुछ तो हो जो अब दिल को संभाले अपने..
अब तो हर वक्त जैसे.. इस दिल का जाना लगता है..
क्या कहूं के ये भोर है के शाम ..
यूं तो अब हमें हर वक्त ही सुहाना लगता है..
कहते हैं वो के.. "बातें" बना रहे हो तुम..
कैसे बतायें के.. उन्ही से हमें ये ज़माना लगता है..
...
...
दिल में तरंगें सी जो उठती हैं यूं ..
ये तो जैसे उनका गुदगुदाना लगता है..
हमें सताके हस्ते हैं वो.. नही जानते के ख़ुद भी फसते हैं वो..
दूर जाके जैसे फ़िर से पास आना लगता है..
चाँद में दिखता है जिसका चेहरा.. हर वक्त है जैसे जिसका पहरा ..
वो इंसान हमें अब खुदा से भी सुहाना लगता है ..
क्या बात है उनमे ऐसी .. ये हम नही जानते ..
लेकिन अब तो बस उनके लिए जीना .. फ़िर मर जाना लगता है ..
Wednesday, January 9, 2008
नसीब
ज़रूरत तो उसकी जान से भी ज़्यादा है
पर वो मेरे नसीब में नही है,
दील पे लीखा है सिर्फ़ उनका नाम
पर उसके हाथों में मेरी लकीर ही नही है
पर वो मेरे नसीब में नही है,
दील पे लीखा है सिर्फ़ उनका नाम
पर उसके हाथों में मेरी लकीर ही नही है
ehsaas
I dedicate this one to Arvind Batra, who gave me the kickstart to write this :)
Ek dard hai, ek ehsaas hai..
ek dard ka ehsaas hai ..
Maana ki ye haar hai..
lekin ye haar bhi kuch khaas hai..
Maiyyat par aate hain humaari.. aur haske chale jate hain..
aise chaahne waale kyun aaj bhi dil ke paas hai
Maana is ehsaas mein hai dard hi dard..
lekin fir bhi ye ehsaas humaare liye bahut khaas hai
Ek dard hai, ek ehsaas hai..
ek dard ka ehsaas hai ..
Maana ki ye haar hai..
lekin ye haar bhi kuch khaas hai..
Maiyyat par aate hain humaari.. aur haske chale jate hain..
aise chaahne waale kyun aaj bhi dil ke paas hai
Maana is ehsaas mein hai dard hi dard..
lekin fir bhi ye ehsaas humaare liye bahut khaas hai
Saturday, January 5, 2008
अकेला
मंजीलें भी उस की थी
रास्ता भी उस का था
एक मैं ही अकेला था
काफीला भी उस का था
साथ साथ चलने की सोच भी उस की थी
फीर रास्ता बदलने का फ़ैसला भी उस का था
आज क्यों अकेला हूँ दील सवाल करता है
लोग तों उस के थे, क्या खुदा भी उस का था ??
रास्ता भी उस का था
एक मैं ही अकेला था
काफीला भी उस का था
साथ साथ चलने की सोच भी उस की थी
फीर रास्ता बदलने का फ़ैसला भी उस का था
आज क्यों अकेला हूँ दील सवाल करता है
लोग तों उस के थे, क्या खुदा भी उस का था ??
Friday, December 28, 2007
तन्हाई
आंखों में क्यों आंसू छलक जाते हैं..
तन्हाईयों में क्यों गम याद आते हैं ..
आंसू पोंछ कर कोई बता दे हमें ...
भूल जाने वाले क्यों अक्सर याद आते हैं..
आंसुओं को बहुत समझाया की तन्हाई में आया करो ..
इस तरह महफिल में हमारा मजाक मत उड़ाया करो..
पर आंसू रो पड़े .. और टपक कर बोले..
इतने लोगों में आपको तनहा पाते हैं ..इसलिए चले आते हैं..
तन्हाईयों में क्यों गम याद आते हैं ..
आंसू पोंछ कर कोई बता दे हमें ...
भूल जाने वाले क्यों अक्सर याद आते हैं..
आंसुओं को बहुत समझाया की तन्हाई में आया करो ..
इस तरह महफिल में हमारा मजाक मत उड़ाया करो..
पर आंसू रो पड़े .. और टपक कर बोले..
इतने लोगों में आपको तनहा पाते हैं ..इसलिए चले आते हैं..
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